चीन पर नेहरू की गलतियां ना करें PM मोदी, इन बातों का रखें ध्यान तो काबू में आ जाएगा ड्रैगन

New Delhi: भारत और चीन (India China) के बीच सीमा पर तनाव नया नहीं है। आज चीन के साथ फिर वैसे ही हालात बने हैं। पूर्वी लद्दाख के कई इलाकों में चीनी सेना की घुसपैठ हुई है। इस बीच, गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच हिं’सक झड़प हुई जिसमें 20 भारतीय जवान शही’द हो गए। इसके बाद से, देश में चीन विरोधी माहौल चरम पर है।

ड्रैगन (India China) के आर्थ‍िक बायकॉट के साथ-साथ युद्ध की ललकार तेज होती जा रही है। कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी चीनी प्रॉडक्‍ट्स का बहिष्‍कार करने की मुहिम चलाई है। ऐसे में जरूरत है इतिहास में झांकने की और उन गलतियों को न दोहराने की, जो पहले की जा चुकी हैं।

चीन की सैन्‍य ताकत का अंदाजा नहीं लगा पाए थे नेहरू

1959 में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के बाद, नेहरू ने फारवर्ड पॉलिसी लागू करने का मन बनाया। सेना को आदेश दिए गए कि चीनी सैनिकों को विवादित जमीन से बेदखल किया जाए। बिना जमीनी हालात का अंदाजा लगाए हुए इस फैसले से भारत को तगड़ा नुकसान झेलना पड़ा।

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चीन ने हमारे कई इलाकों पर कब्‍जा कर लिया। भारत ने सैनिकों को गंवाया, वो अलग। आज चीन और भारत, दोनों देशों की सेनाएं कहीं ज्‍यादा मजबूत और एडवांस्‍ड हैं मगर 1962 में चीन ने जिन इलाकों में कब्‍जा किया, वे ऊंचाई वाले इलाके हैं और पहाड़ी इलाकों में नीचे से जंग लड़ना आसान नहीं। इसलिए फुल-फ्लेज्‍ड वॉर से बचने की सलाह कई रिटायर्ड सैनिक भी दे रहे हैं।

आत्‍मनिर्भरता का सही मतलब समझना होगा

नेहरू और उनके बाद इंदिरा गांधी ने अलग आर्थिक नीति अपनाई। दोनों ने हर चीज भारत में बनाने की कोशिश की। उसका असर ये हुआ कि 1947 से 1980 के बीच देश की GDP सिर्फ 3.5% की दर से बढ़ी। गरीबी कम नहीं हुई जबकि आबादी लगभग दोगुनी हो चुकी थी। बाद में नरसिम्‍हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों ने ग्‍लोबल ट्रेड और इनवेस्‍टमेंट के दरवाजे खोले। फिर GDP की रफ्तार 9% से ज्‍यादा हो गई। नेहरू विदेशी निवेश से कतराते रहे।

क्‍या है मोदी का आत्‍मनिर्भर प्‍लान?

पीएम मोदी के ‘आत्‍मनिर्भर’ अभियान का मकसद सिर्फ स्‍वदेशी को बढ़ावा देना ही नहीं, ग्‍लोबल वैल्‍यू चेन्‍स में आगे रहना भी है। मोदी को विदेशी निवेश चाहिए। वह विदेशी निवेशकों को टैक्‍स में छूट, सस्‍ती जमीन और इन्फ्रास्‍ट्रक्‍चर के वादे करते हैं। सैमसंग और नोकिया भारत में बड़ी फैक्ट्रियां लगा चुके हैं। दुनिया की हर बड़ी ऑटो कंपनी भारत में मौजूद है। ग्‍लोबल इकनॉमी के साथ भारत के जुड़ाव ने उसे आर्थिक प्रगति में मदद की है।

​चीन के बायकॉट में प्रॉब्‍लम कहां?

भारत में चीनी उत्‍पादों के बायकॉट की मुहिम चलाई जा सकती है। नागरिक चीनी सामान खरीदना बंद कर सकते हैं मगर भारत आधिकारिक रूप से ऐसा करने से बचेगा। क्‍योंकि वर्ल्‍ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन में चीन और भारत दोनों शामिल हैं। ग्रुप के किसी सदस्‍य को बाकी सभी सदस्‍यों के बराबर टैरिफ ही ऑफर करना होता है। इसी नियम के चलते भारत को भी टैरिफ्स में रियायत मिलती है।

चीन को कैसे काबू में रख सकता है भारत

परचेजिंग पावर के हिसाब से देखें तो चीन सबसे बड़ी इकनॉमी है। वह दुनिया का सबसे बड़ा एक्‍सपोर्टर है। फॉरेन इनवेस्‍टमेंट में उसकी सरप्‍लस सेविंग्‍स सबसे ज्‍यादा हैं। टेलिकॉम, सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रिक रिक्‍शा और स्‍टोरेज बैट्रीज में वह वर्ल्‍ड लीडर है।

भारत नैशनल सिक्‍योरिटी से जुड़े एरियाज में इम्‍पोर्ट और FDI पर लिमिट लगा सकता है। साउथ चाइना सी को लेकर ASEAN देशों ने चीन के बायकॉट की नहीं, मजबूत सहयोगी बनाने की रणनीति अपनाई है। भारत को भी यही करना चाहिए। चीन पर काबू करने के लिए उसे डिप्‍लोमेटिक संबंधों को धार देनी चाहिए।

अमेरिका की चीन पर पकड़ इसीलिए है क्‍योक‍ि दोनों की अर्थव्‍यवस्‍थाएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अमेरिका ZTE और Huawei जैसी कंपनियों को कभी भी तगड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में भारत की कोशिश चीनी कंपनियों पर लेवरेज बढ़ाने की होनी चाहिए और मिलिट्री से ज्‍यादा डिप्‍लोमेसी से जवाब देने की कोशिश हो। नेहरू इन्‍हीं दो मोर्चों पर फेल हुए थे, पीएम मोदी को वे गलतियां दोहराने से बचना चाहिए।

(नोट: सभी जानकारी विभिन्न मीडिया रिपोर्टों से लिए गए तथ्यों पर आधारित है)