Guru Purnima 2020: गुरु पूर्णिमा पर जानें उन 7 गुरुओं को.. जिन्हें प्रलय तक याद रखेगी दुनिया

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Guru Purnima 2020, गुरु पूर्णिमा
(Image Courtesy: Google)
New Delhi: आषाण मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima 2020) का पर्व मनाया जाता है। इस दिन गुरुओं की पूजा की जाती है क्योंकि उनके ज्ञानमयी प्रकाश से जीवन का अंधकार दूर होता है और फिर ईश्वर से साक्षात्कार हो पाता है।

हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima 2020) का विशेष महत्व है। इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था इसलिए इसको व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima 2020) के विशेष दिन पर हम आपको कुछ ऐसे गुरुओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको दुनिया प्रलय तक याद रखेगी क्योंकि इन गुरुओं के शिष्य स्वयं भगवान भी रहे हैं और कुछ गुरुओं ने अखंड भारत का निर्माण भी किया था। आइए जानते हैं इन गुरुओं के बारे में….

वशिष्ठ मुनि

वशिष्ठ मुनि वैदिक काल के विख्यात ऋषि माने गए हैं। वह राजा दशरथ के राजगुरु भी थे और भगवान राम के गुरु भी थे। उन्होंने ज्ञान देकर भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया और राम की राज्याभिषेक की पूरी व्यवस्था की। भगवान राम इनकी आज्ञा के बिना कोई कार्य नहीं करते थे। वशिष्ठ मुनि को सप्त ऋषियों में स्थान प्राप्त है, जिनको ईश्वर द्वारा सत्य का ज्ञान हुआ। आकाश में चमकते सात तारों में उनका एक स्थान है।

महर्षि वेदव्यास

गुरु पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास महाभारत ग्रंथ और 18 पुराणों के रचयिता थे। वेदव्यास जी ना केवल महाभारत के रचियता थे बल्कि उन चीजों के भी साक्षी भी रहे, जो घटना घटती रहीं। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को अपने शिष्यों को सौंप दिए थे। बहुत से लोग गुरु पूर्णिमा के दिन उनके रचित ग्रंथों का अध्ययन करते हैं।

भगवान परशुराम

परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, उनके गुरु स्वयं भगवान शिव और भगवान दत्तात्रेय थे। महादेव से ही उनको मोघ परशु प्राप्त हुआ था इसलिए उनका नाम परशुराम पड़ गया था। उन्होंने क्षत्रियों के अंहकार को खत्म करने के लिए कई बार क्षत्रियों का नाश कर दिया था। पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और दानवीर कर्ण उनके प्रमुख शिष्यों में से माने जाते थे। इन्होंने अपने शिष्यों को भी अपने जैसा शक्तिशाली बनाया था।

गुरु द्रोणाचार्य

महर्षि भारद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य को द्वापरयुग के महान गुरुओं में माना जाता था। वह देवगुरु बृहस्पति के अंशावतार माने जाते थे। उन्होंने कौरव और पांडव समेत इस कुल के सभी राजकुमारों को दीक्षा दी थी और अस्त्र-शस्त्र चलाने कि विद्या का ज्ञान दिया था। अर्जुन उनके सबसे महान शूरवीर शिष्यों में से एक थे और महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन से ही वीरगति प्राप्त हुई थी। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को मानस गुरु मानकर उनसे शिक्षा प्राप्त की थी।

ऋषि सांदीपनी

संदीपनी ऋषि भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा के गुरु थे। इन्होंने ही कृष्ण को चौंसठ दिन में चौंसठ कलाएं सीखाईं थीं तथा वेद-पुराण का अध्ययन भी कराया था। संदीपनी का अर्थ है, देवताओं के ऋषि। आज भी उज्जैन में उनका आश्रम मौजूद है। भगवान कृष्ण ने गुरु दक्षिणा के रूप में उनको मृत पुत्र को मांगा था, जो उन्होंने दिया।

महर्षि विश्वामित्र

महर्षि विश्वामित्र भी भगवान राम के गुरु थे। इन्होंने ही भगवान राम को धनुर्विद्या के ज्ञान दिया था। वह बड़े प्रतापी और तेजस्वी थे। उन्होंने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या करके क्रोध पर विजय प्राप्त कर ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया था। उन्होंने अपने यज्ञ को पूर्ण करने के लिए भगवान राम और लक्ष्मण को ले गए थे और राम-सीता का विवाह भी उन्होंने ही करवाया।

आचार्य चाणक्य

आचार्य चाणक्य के गुरु उनके पिता चणक थे और वह महान सम्राट चंद्रगुप्त के गुरु थे। उन्होंने मानव कल्याण के लिए कई नीतियां बनाई हैं। जो इन नीतियों पर चलेगा उसके जीवन में कभी कोई समस्या नहीं आएगी। उन्होंने गांव के एक लड़के चंद्रगुप्त मौर्य को भारत का सम्राट बनाया और मौर्य साम्राज्य की स्थापना करवाई।

उन्होंने अपनी कूटनीति के बल पर अखंड भारत का निर्माण किया था। आचार्य चाणक्य का मूल नाम विष्णुगुप्त था, इन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की थी और वहीं आचार्य बनकर छात्रों का ज्ञान दिया।