‘मेरी मजदूरी नहीं मिली…’ जानें, पूर्व PM अटल बिहारी वाजपेयी के दिलचस्प किस्से

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(Image Courtesy: Google)
New Delhi: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) की आज दूसरी पुण्यतिथि है। पीएम मोदी (PM Narendra Modi) ने ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी है।

मोदी (PM Narendra Modi) ने अपने संदेश में कहा कि देश के विकास में आपके (Atal Bihari Vajpayee) योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) की जिंदगी से जुड़े यूं तो ढेरों किस्से हैं जो बेहद दिलचस्प हैं, लेकिन इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनका जिक्र करते हुए अटल खुद भी मुस्कुरा उठते थे। आइए नजर डालते हैं अटल बिहारी वाजपेयी की जीवन से जुड़े कुछ खास किस्सों पर।

लखनऊ की ठंडाई और अटल जी का जवाब नहीं

लखनऊ से अटल जी (Atal Bihari Vajpayee) को विशेष स्‍नेह था। उन्‍हें जितना लखनऊवालों से स्‍नेह था उतना ही यहां के खानपान से। यहां अटल जी की पसंदीदा दुकान चौक की राजाजी ठंडाई। अटल बिहारी वाजपेयी जी अक्सर इस दुकान पर जाया करते थे और यहां की ठंडाई पीना नहीं भूलते थे।

दुकान के मालिक त्रिपाठी बताते हैं, ‘एक बार अटल जी के साथ बीजेपी के कई बड़े नेता दुकान में आए हुए थे। काफी देर तक चुनावों पर चर्चा होती रही, इसके बाद पिता जी ने पूछा कि ठंडाई कैसी रहेगी? सादी या? उनका इतना बोलना था कि अटल जी तुरंत मजाकिया लहजे में बोले, शादी तो मैंने की ही नहीं।’

‘इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है?’

लखनऊ की एक और याद साल 1996 से जुड़ी है। अटल बिहारी वाजपेयी 1996 आम चुनाव के बाद में पहली बार प्रधानमंत्री बने थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ से चुनाव लड़ा था और उनके खिलाफ खड़े थे मशहूर निर्देशक मुजफ्फर अली। इसमें मुजफ्फर अली को मात मिली लेकिन वह अपने विरोधी अटल जी के कायल हो गए।

मुजफ्फर अली आगे बताते हैं ‘मेरी पहली फिल्म गमन में एक शेर था, ‘सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है?’ इस शेर को अटल जी जब भी मिलते थे मेरे सामने जरूर रिपीट करते थे।’

जब कोतवाल ने अटल के पिता से कहा…

1942 में जब महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा दिया तो ग्वालियर भी अगस्त क्रांति की लपटों में आ गया। खासियत यह थी कि कोई भी आंदोलन हो, लेकिन आगे अटल ही रहते थे। कोतवाल अटल के पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी के परिचित थे। एक दफा जब वह कृष्ण बिहारी से मिले तो बताया कि आपके चिरंजीव जेल जाने की तैयारी कर रहे हैं।

अपनी नौकरी की फिक्र में कृष्ण बिहारी वाजपेयी ने अटल को पैतृक गांव बटेश्वर भेज दिया। हालांकि,अटल फिर भी न माने और पुलिस के चंगुल में फंस ही गए। नाबालिग होने की वजह से अटल को बच्चा बैरक में रखा गया। चौबीस दिनों की अपनी इस पहली जेल यात्रा को अटल हंस-हंसकर सुनाते थे

​पत्रकारिता से की जीवन की शुरुआत

अटल बिहारी वाजपेयी की प्रारंभिक पढ़ाई ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज से हुई। बता दें कि विक्टोरिया कॉलेज को अब लक्ष्मीबाई कॉलेज के नाम से जाना जाता है। अटल ने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता से शुरुआत की। यही नहीं, उन्होंने राष्ट्र धर्म, पाञ्चजन्य और वीर अर्जुन का संपादन भी किया।

और तीन में से दो सीटों पर हार गए थे अटल

अटल बिहारी वाजपेयी ने 1955 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों (लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर) से चुनाव लड़ाया। हालांकि, अटल बिहारी लखनऊ से चुनाव हार गए और मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वह दूसरी लोकसभा में पहुंच गए। यहीं से अगले पांच दशकों के उनके संसदीय कामकाज की नींव पड़ी।

जब अटल ने नेहरू जी की तस्‍वीर लगवाई

आखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर ने बताया कि जब अटलजी विदेश मंत्री का कार्यभार संभाल कर कार्यालय पहुंचे तो वहां पर एक दीवार खाली थी। पूछने पर पता चला वहां जवाहर लाल नेहरू की फोटो लगी थी। चूंकि अटल जनसंघ से जुड़े इसलिए उन्हें खराब न लगे इसलिए कर्मचारियों ने उसे हटा दिया। इस पर अटल जी ने कहा कि ‘मैं जनसंघ से जुड़ा हूं तो हमारे वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन वो देश के प्रधानमंत्री रहे हैं।’ इसके बाद उन्होंने नेहरू की तस्वीर वहां लगवाई।

​’मेरी मजदूरी नहीं मिली’

जनसंघ के जमाने के 83 साल के पुराने कार्यकर्ता और बलिया जिले के रहने वाले सुधाकर मिश्र ने अटल से जुड़ी अपनी ढेरों यादें साझा की हैं। मिश्र बताते हैं कि जब उन्हें बलिया के द्वाबा से प्रत्याशी बनाया गया था तब अटलजी वहां जनसभा करने आए थे।

तब मुख्य अतिथि को 11 हजार रुपये की थैली देकर स्वागत करने की परंपरा थी। अटलजी आए और एक के बाद एक 13 जनसभाएं संबोधित कीं। जनसभा समाप्त हुई लेकिन अटल की थैली उन्हें नहीं मिली। तब अटल जी ने मिश्र जो को बुलाया और अंत में उनसे बोले, ‘तुम तो बड़े चालाक निकले। हमसे मजदूरी करा ली लेकिन मजदूरी नहीं दी।’